अर्नब के वकील हरीश साल्वे ने सुप्रीम कोर्ट में उद्धव ठाकरे पर निशाना साधते हुए दी दलील, बोले उन्हें भी…

रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क के एडिटर इन चीफ अर्णब गोस्वामी को 2 साल पहले हुए एक इंटीरियर डिज़ाइनर की आत्महत्या के केस में गिरफ्तार किया गया था। अर्णब गोस्वामी को हाईकोर्ट में जमानत देने से इनकार कर दिया था। वहीं आज यानी बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में उनकी जमानत की अर्जी को लेकर सुनवाई हुई है। अर्णब गोस्वामी की तरफ से उनके वकील हरीश साल्वे ने उनकी गिरफ्तारी पर सवाल उठाते हुए दलीलें दी है।

बता दे कि इस मामले में जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदिरा बनर्जी ने सुनवाई की है। वरिष्ठ वकील साल्वे ने दलील देते हुए कहा है कि, अर्णब गोस्वामी को 3 साल पुरानी एफआईआर में गिरफ्तार कर लिया गया। जिसके बाद उन्हें उस जेल में रखा गया है। जहां पर अंडरवर्ल्ड से जुड़े लोग सजा काट रहे हैं। यहां तक कि जेल में उनके साथ बदसलूकी भी की जा रही है। यह व्यवहार किसी भी लिहाज से सही नहीं हैं।

क्या मुख्यमंत्री को भी होगी जेल

अर्णब गोस्वामी की जमानत अर्जी को लेकर सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने महाराष्ट्र में पिछले महीने घटी एक घटना का भी जिक्र किया। उन्होंने अदालत को बताया कि, पिछले महीने महाराष्ट्र में चीफ मिनिस्टर का नाम लेते हुए एक व्यक्ति ने आत्महत्या कर ली थी। उस व्यक्ति ने बताया था कि मुख्यमंत्री ने उसे उसका वेतन नहीं दिया है। तो क्या इस केस में भी महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को जेल भेज दिया जाएगा। इसके साथ ही उनकी जमानत की अर्जी भी खारिज होगी।

अगर मुख्यमंत्री के साथ ऐसा व्यवहार नहीं किया जा सकता तो फिर अर्णब गोस्वामी को किस बात की सजा दी जा रही है। उन्होंने यह भी कहा कि, महाराष्ट्र सरकार केवल अर्णब गोस्वामी को सबक सिखाने, उनसे बदला लेने के लिए यह सब कर रही है। जबकि कोर्ट को इस मामले में उन्हें पहले ही दिन जमानत दे देनी चाहिए थी। लेकिन उनकी जमानत की अर्जी बार-बार खारिज कर दिया गया।

न्याय का मखौल बनाया जा रहा है

सुप्रीम कोर्ट ने भी इस केस में हाईकोर्ट के फैसले की निंदा की है। कोर्ट ने कहा है कि, हर व्यक्ति के निजी अधिकारों की रक्षा करना सुप्रीम कोर्ट का कर्तव्य है। राज्य सरकार केवल अपने मकसद के लिए किसी भी व्यक्ति को निशाना नहीं बना सकती है। अगर सरकार द्वारा ऐसा कोई काम किया जाता है तो ऐसे में कोर्ट की जिम्मेदारी है कि वह निष्पक्ष होकर फैसला करें। कोर्ट ऐसा नहीं करती तो यह न्याय का मखौल बनाना होगा। अदालत ने सरकार से यह भी कहा कि, उन्हें अर्णब गोस्वामी के कटाक्षों को नजरअंदाज करके केवल इस केस को ध्यान में रखते हुए फैसला लेना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा है कि, पिछले दिनों उन्होंने ऐसे बहुत से केस देखे हैं जिनमें हाईकोर्ट ने व्यक्ति के निजी अधिकारों की रक्षा नहीं की है। सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक़, अगर कोई व्यक्ति किसी के पैसे नहीं देता है और ऐसे में सामने वाला व्यक्ति आत्महत्या कर ले। तो ऐसे में उकसाने वाली बात कहां से आ जाती है। इस मामले में धारा 306 लगाना बेबुनियाद है।

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